(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.137. अध्यायः 137
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति अनागतापत्प्रतिविधाने दृष्टान्ततया मत्स्योपाख्यानकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-137-0x(5724)(70070)
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः।
द्वावेतौ सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति॥ 12-137-1(70071)
अत्रैव चेदमव्यग्रं शृण्वाख्यानमनुत्तमम्।
द्रीर्घसूत्रमुपाश्रित्य कार्याकार्यविनिश्चये॥ 12-137-2(70072)
नातिगाधे जलस्थाने सुहृदः कुशलास्त्रयः।
प्रभूतमत्स्ये कौन्तेय बभूवुः सहचारिणः॥ 12-137-3(70073)
तत्रैकः प्राप्तकालज्ञो दीर्घदर्शी तथाऽपरः।
दीर्घसूत्रश्च तत्रैकस्त्रयाणां जलचारिणाम्॥ 12-137-4(70074)
क्रदाचित्तज्जलस्थानं मत्स्यबन्धाः समन्ततः।
स्रावयामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखैः॥ 12-137-5(70075)
क्षीयमाणं तद्बुद्ध्वा जलस्थानं भयागमे।
अब्रवीद्दीर्घदर्शी तु तावुभौ सुहृदौ तदा॥ 12-137-6(70076)
ज्ञयमापत्समुत्पन्ना सर्वेषां सलिलौकसाम्।
शीघ्रमन्यत्र गच्छामः पन्था यावन्न शुष्यति॥ 12-137-7(70077)
अनागतमनर्थं हि सुनयैर्यः प्रबाधते।
स न संशयमाप्नोति तथाऽन्यत्र व्रजामहे॥ 12-137-8(70078)
शीर्घसूत्रस्तु यस्तत्र सोऽब्रवीत्सम्यगुष्यताम्।
न तु कार्या त्वरा तावदिति मे निश्चिता मतिः॥ 12-137-9(70079)
अथ संप्रतिपत्तिज्ञस्त्वब्रवीद्दीर्घदर्शिनम्।
प्राप्ते काले न मे किंचिन्न्यायतः परिहास्यते॥ 12-137-10(70080)
एवप्नुक्तो निराक्रामद्दीर्घदर्शी महामतिः।
अगाम स्रोतसैकेन गम्भीरं सलिलाशयम्॥ 12-137-11(70081)
ततः प्रसृततोयं तं प्रसमीक्ष्य जलाशयम्।
बबन्धुर्विविधैर्योगैर्मत्स्यान्मत्स्योपजीविनः॥ 12-137-12(70082)
विलोड्यमाने तस्मिंस्तु स्रुततोये जलाशये।
अगच्छद्ग्रहणं तत्र दीर्घसूत्रः सहापरै----॥ 12-137-13(70083)
उद्दानं क्रियमाणं तु मत्स्यानां ------।
प्रविश्यान्तरमन्येषामग्रसत्प्रति-------॥ 12-137-14(70084)
ग्रस्तमेव तदुद्दानं गृहीत्वा----सः।
सर्वानेव च तांस्तत्र ते वि--- इति॥ 12-137-15(70085)
ततः प्रक्षाल्यमानेषु मत्स्येषु विपुले जले।
त्वक्त्वा रज्जुं प्रमुक्तोसौ शीघ्रं संप्रतिपत्तिमान्॥ 12-137-16(70086)
दीर्घसूत्रस्तु मन्दात्मा हीनेयुद्धिरचेतनः।
मरणं प्राप्तवान्मूढो यथैवोपहतेन्द्रियः॥ 12-137-17(70087)
एवं प्राप्ततमं कालं यो मोहान्नावबुध्यते।
स विनश्यति वै क्षिप्रं दीर्घसूत्रो यथा झषः॥ 12-137-18(70088)
आदौ न कुरुते श्रेयः कुशलोऽस्मीति यः पुमान्।
स हि संशयमाप्नोति यथा संप्रतिपत्तिमान्॥ 12-137-19(70089)
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्च यः।
द्वावेतौ सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति॥ 12-137-20(70090)
काष्ठा कला मुहूर्ताश्च दिनरात्र्यः क्षणा लवाः।
मासाः पक्षाः षडृतवः कालः संवत्सराणि च॥ 12-137-21(70091)
पृथिवी देश इत्युक्तः स च कालो न दृश्यते।
अभिप्रेतार्थसिद्ध्यर्थं दूरतो न्यायतस्तथा॥ 12-137-22(70092)
एतौ धर्मार्थशास्त्रेषु मोक्षशास्त्रेषु चर्षिभिः।
प्रधानाविति निर्दिष्टौ कामे चाभिमतौ नृणाम्॥ 12-137-23(70093)
परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत्।
देशकालावभिप्रेतौ तोभ्यां फलमवाप्नुयात्॥ ॥ 12-137-24(70094)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 137॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-137-4 तत्रैको दीर्घकालज्ञ उत्पन्नप्रतिभोऽपरः इति झ. पाठः॥ 12-137-5 विविधैर्मुखैर्जलनिर्गमनमार्गैः॥ 12-137-11 सलिलाशयं जलाशयान्तरम्॥ 12-137-14 उद्दानं ग्रथनं अग्रसत् ग्रथनसूत्रं मुखेन जग्राहेत्यर्थः॥ 12-137-15 सच मत्स्यः तथैव गृहीतवदेव तत्रास्ते इति शेषः॥ 12-137-21 कालस्य देशस्य च सूक्ष्मतां अवहितो जानीयादिति श्लोकद्वयार्थः॥ 12-137-23 एतौ देशकालौ॥


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